Pursuance…

Someting and Eveything

मंथन January 26, 2011

Filed under: Poems — Prashant @ 12:07 AM
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लो फिर शाम आयी,

सूरज़ को हरा दिया अब चाँद की बारी आयी,

गिरफ़्त बड़ी है इसके हाथ कि,

अलाव के बिना ना ज़ान छूटेगी ।

हर साँस ज़मा ड़ालेगी इसकी,

फेफड़ों में जम जाने की,  है हसरत इसकी ।

कपड़े भी तुम्हारे साथ ना देंगे,

तुम्हें ‘नग्न’ चौराहे पर छोड़गें ।

टांगे तुम्हारी सरपट दौड़ेंगी,

घर पहुँचने को घोड़े को मात देंगी ।

गर्माहट लिहाफ़ की या चुस्की चाय कि,

फिर भी आवाज़ आयेगी इसके चाबुक कि ।

धुंआ तुम्हारी हर सांस से निकलेगा,

जोश इसका तुम्हारा लहु भी ज़मा ड़ालेगा ।

अब बताओ किस लिहाफ में घुसोगे,

कौन सी चाय जन्मान्तर तक पियोगे,

ये तुम्हें हर लिहाज़ में जकड़ेगी,

तुम्हारी आत्मा को भी ज़मा देगी ।

फिर शहर यह बुतों का होगा,

राज इसमें सिर्फ़ करतूतों का होगा ।

अब कपकपांहट होंठो कि,

या दहलाती आवाजॉ की,

निश़ान चाबकों के,

या जमे हुये खून के

रोज़ सरपट दौड़ायेंगे, रुलायेंगे, तड़पायेंगे और तड़पायेंगे ।

 

जब तक,

 

तुम रुक कर,

 

अपनी धकधकाती धड़कनों कि,

धड़कती कंपन पर ।

 

मंथन कर,

 

हलाहल पान कर,

 

‘आत्म विज़य’ को युद्ध करने

 

उतर ना जाओगे ।

 

आखिर मैं कविता क्यों लिखता हूँ । January 3, 2011

Filed under: Poems — Prashant @ 11:16 PM
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क्या आप जानते हैं, शायद नहीं,

मैं भी नहीं जानता हूँ, पर समझना चाहता हूँ,

अपने आप को बतलाना चाहता हूँ,

कि कागज़ पर मैं स्याही से क्यों वर्ण लिखता हूँ ।

सूरज अपने रंग क्यों बदलता है,

कभी लाल, कभी पीला, कभी गुलाबी क्यों हो जाता है ।

चन्द्रमा अपना आकार एक ही क्यों नहीं रखता,

अभी पूरा, तो कभी आधा, कभी लोप क्यों हो जाता है ।

वृक्ष फल क्यों देते हैं, पत्थर खाने के लिये क्या,

पत्ता वृक्ष पर क्यों होता है, झड़ जाने के लिये क्या ।

क्या आप भी नहीं जानते, मैं भी नहीं ।

पर जानना चाहता हूँ ।

क्योंकि कविता के यही सोत्र हैं,

जो कभी बदलते नहीं ।

लेकिन फिर भी ‘मैं कविता क्यों लिखता हूँ’

शायद एक आवाज़ जो अंदर से आती है,

‘क्या अन्तरआत्मा की’,

वो ही कागज़ कलम हाथ मैं थमा देती है क्या,

वे अधूरे प्रश्न जिनके मैं उत्तर चाहता हूँ,

क्या वे ही कविता बन जाते हैं ।

यही बात मैं समझना चाहता हूँ,

आख़िर कविता अधूरे प्रश्नों कि अधूरी कहानी क्यो होती है ।

कविता कभी पूर्ण क्यो नहीं होती,

‘यह बात मैं थोड़ी समझता हूँ’,

कि कवि कभी पूर्ण नहीं होता,

अपने को पूर्ण करने के लिये वह कविता लिखता है ।

 

पर मैं कविता क्यों लिखता हूँ,

‘क्या मैं भी अपूर्ण हूँ ‘।

 

नया साल December 31, 2010

Filed under: Poems — Prashant @ 11:44 PM
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सूर्य्र की किरणों में नयापन होता है,

फूलों के खिलने का अंदाज अलग होता है,

हवा के दुलारने में अलग बात होती है,

और कुछ नहीं यह नये साल कि उमंग होती है ।

 

बहुत सी यादें फूलों का अहसास दिलाती हैं,

तो कुछ कांटो की तरह बींध जाती हैं,

कभी कोई अहसास हंसा जाता है,

तो कोई अंदर से रुला जाता है,

लेकिन एक बात हमेशा याद रहती है, आने वाले साल में उमंग होती है ।

 

यादें बहुत सी प्यारी होती हैं, जो बड़े प्यार से सहला जाती हैं,

तो कुछ कठोर होती हैं,जो चोट मार जाती हैं,

लेकिन फिर भी एक आशा होती है, कि नये साल में बात सिर्फ प्यारी होगी ।

 

कुछ आपने ऐसा भी किया होगा, जिसे याद करके आपका दिल काँप गया होगा ,

लेकिन इस बार आप प्रण लेंगे, जो किया वह दुबारा नहीं दोहरायेंगे

इस साल में एक बात यह भी होगी,

हर बात प्यारी होगी, हर काम में लगन होगी,

और हर बार हमारी जीत होगी ।

 

 

 

 

शुभकामना December 31, 2010

Filed under: Poems — Prashant @ 10:13 PM
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शब्दों को जोड़ दो, और बना दो कविता,

पर ये कविता है कहां, जहां र्स्पश ना हौ ।

“ और उसी को, मैं तुम्हें देना चाहता हूँ”

 

आंखों से कहो ‘देखो’, पर वहां क्या देखना जहां अंधेरा हो,

उजाले की ओर देखो, जहां मैं तुम्हें देखता हूँ ।

“और उसी ओर , मैं तुम्हें ले जाना चाहता हूँ”

 

सपनों से कहो ‘आओ’, और मुझ पर छा जाओ,

पर वे सपने ही क्या, जो सूनेपन मैं आयें ।

” और उसी को, मैं मिटाना चाहता हूँ ”

 

रंगो से कहो ‘भर’ जाओ, और बन जाओ तस्वीर,

पर वे कैसे भरें, जहां लकीर ही ना हो ।

“ और वो ही कागज, मैं तुम्हें देना चाहता हूँ “

 

अब भास्कर से मत पूंछना, कि निशा कौन,

निशा से पूंछना कि, यह चाँदनी किसकी ।

“वही शीतलता, मैं तुममे चाहता हूँ”

 

बादलों से कहो बरस जाओ, पर वे कैसे बरसें,

जहां ना तो नीर हो, ना ही तुम

“वही नीर, मैं तुम्हें देना चाहता हूँ” ।

 

अब वर्ष से कहो, मेरे रंग में रंग जाओ,

पर वह कैसे रंगे , जहां शुभकामना ही ना हो ।

“ और वही , मैं तुम्हें दे रहा हूँ”

” नव वर्ष शुभ हो “

 

 

 

जिंदगी December 27, 2010

Filed under: Poems — Prashant @ 8:39 PM
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जिंदगी यू  भागती सी जाती है,

रोको तो कहां रुकती है।

तुम सोचते हो कि रुक कर,

एक बार तो पूछं ले,

‘ क्या जाना है तुम्हें वहां पर’

मगर कब उसने पूछां है, कब उसने दो पल दुलारा है,

बोलो कब तुम्हारी तरफ उसने देखा था,

उसे एक ही चीज़ तो आती है, वो खीचती सी ले जाती है

तुम्हारे पैरौ का दर्द उसे, और तेज़ चलाता है,

तुम्हारे ह्रदय का विषाद उसे, अलग दिशा ले जाता है,

जब आसूं तुम्हारे दो टपके थे,

बोलो कहां वह रुकी थी,

वह फिसलती हुयी सी,

तुमको खीचती सी ले गयी थी

तुम दुशमन नही हो उसके,पर दोस्त भी कैसे कहे

तुम चाहो रोकना उसे, उसे तो बस चलना आये,

भूल गये तुम चलने से, क्या क्या तुमको है मिला,

वही खीचती सी तुम्हें, उस खुशी तक लायी थी

सुन तुम्हारी वो हसीं, वह भी मुस्कायी थी,

क्या उसने तुम्हें रोका था, जब खुशी तुम्हें ना भायी थी

याद करो तन्हाई की उस कोठरी से वही,

बाहर खीचती सी लायी थी,

गम के अगर रास्ते मिले हैं,

विजय गान भी गायेंगे,

जिंदगी के साथ हम, आग बढते जायेंगे,

एक दिन फिर ऐसा आयेगा, उससे भी चला ना जायेगा,

एक दिन वह रूकेगी, हाथ तुम्हारे कधें पर रख ,

तुमसे यह कहेगी,

‘ हाथ मेरा अब तुम पकडो,

अब समय वह आया है,

धरती का अब दामन छोड,

अब हमें बस उडना है,’

जब तुम्हें आलिंगन कर,

सीने से चिपटायेगी,

तुम्हें अपने में लीन कर,

जिंदगी स्वयं परमेश्वर में विलीन हो जायेंगी।

 

O Mountains… December 26, 2010

Filed under: Poems — Prashant @ 9:51 AM
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O mountains, I am dreaming about you,

cold winds I am waiting for you,

Snow ‘freeze’ me,

I am feeling so empty without you.

 

Cold breeze with sweet smell,

white water with icelets,

high trees with green leaves,

small grass so green,

how can I ‘live’ without you.

 

Tiring roads with pointed stone,

cold sweat on my nose,

small birds dancing around me ,

seems like singing for me,

Oh what a place to be

 

When I look down the slopes,

its the river hugging the rocks,

I am the man with fighting soul

looking my way around the rocks,

I am so tired in rocky lanes

I need to come again & again

how can I leave you

 

In the morning when sun is rising,

I can see the rays shying,

see when the colors fill the sky,

red snow greets blue mountain high

‘Oh where am I’

 

 

Is it  the heaven I searched  before,

its where you crave for more,

and when you sit with yourself,

what you hear is voice of yours.

 

Now, wherever you go,

Its the body without your soul,

‘O mountains I am yours’.

 

 
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