लो फिर शाम आयी,
सूरज़ को हरा दिया अब चाँद की बारी आयी,
गिरफ़्त बड़ी है इसके हाथ कि,
अलाव के बिना ना ज़ान छूटेगी ।
हर साँस ज़मा ड़ालेगी इसकी,
फेफड़ों में जम जाने की, है हसरत इसकी ।
कपड़े भी तुम्हारे साथ ना देंगे,
तुम्हें ‘नग्न’ चौराहे पर छोड़गें ।
टांगे तुम्हारी सरपट दौड़ेंगी,
घर पहुँचने को घोड़े को मात देंगी ।
गर्माहट लिहाफ़ की या चुस्की चाय कि,
फिर भी आवाज़ आयेगी इसके चाबुक कि ।
धुंआ तुम्हारी हर सांस से निकलेगा,
जोश इसका तुम्हारा लहु भी ज़मा ड़ालेगा ।
अब बताओ किस लिहाफ में घुसोगे,
कौन सी चाय जन्मान्तर तक पियोगे,
ये तुम्हें हर लिहाज़ में जकड़ेगी,
तुम्हारी आत्मा को भी ज़मा देगी ।
फिर शहर यह बुतों का होगा,
राज इसमें सिर्फ़ करतूतों का होगा ।
अब कपकपांहट होंठो कि,
या दहलाती आवाजॉ की,
निश़ान चाबकों के,
या जमे हुये खून के
रोज़ सरपट दौड़ायेंगे, रुलायेंगे, तड़पायेंगे और तड़पायेंगे ।
जब तक,
तुम रुक कर,
अपनी धकधकाती धड़कनों कि,
धड़कती कंपन पर ।
मंथन कर,
हलाहल पान कर,
‘आत्म विज़य’ को युद्ध करने
उतर ना जाओगे ।